समय के साथ अयोध्या ने कई युग देखे हैं, कई परिवर्तन सहे हैं लेकिन जो एक चीज कभी नहीं रुकी, वह है यहां के मेलों का प्रवाह. अयोध्या के मेले केवल तिथियों पर लगने वाले बाजार या भीड़ नहीं हैं; ये इस भूमि की आत्मा हैं. ‘पहले’ की अयोध्या के मेलों में जहां एक ग्रामीण सादगी, आत्मीयता और ठेठ अवधी संस्कृति की महक थी, वहीं ‘आज’ की अयोध्या के मेलों में एक वैश्विक भव्यता, तकनीकी कौशल और नव-निर्माण का अद्भुत तेज है.
अपनी स्मृतियों के झरोखे से अयोध्या के मेलों को याद कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार त्रियुग नारायण तिवारी
सोनपुर मेला बिहार के सोनपुर में गंगा और गंडक नदियों के पवित्र संगम पर आयोजित होने वाला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है। इसे ‘हरिहर क्षेत्र मेला’ या स्थानीय भाषा में ‘छत्तर मेला’ भी कहा जाता है. यह हर साल कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर-दिसंबर) के पावन अवसर पर शुरू होता है और लगभग एक महीने तक चलता है.
इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मेले के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार जयप्रकाश
मेला मानव सभ्यता की उन प्राचीन सांस्कृतिक संस्थाओं में से एक है, जहां मनोरंजन, व्यापार, प्रदर्शन, सामुदायिक जीवन और सामाजिक संपर्क एक साथ दिखाई देते हैं. सिनेमा ने मेले को केवल पृष्ठभूमि के रूप में नहीं इस्तेमाल किया, बल्कि उसे कथा और अर्थ-निर्माण का सक्रिय उपकरण बनाया है. कभी मेला सामूहिक आनंद का प्रतीक है, कभी भय का, कभी वह सामाजिक बहिष्कार को उजागर करता है, कभी वर्गीय विभाजन को; कभी वह मनुष्य की इच्छाओं और कमजोरियों का बाजार बन जाता है और कभी समाज द्वारा बहिष्कृत लोगों के लिए वैकल्पिक समुदाय का स्थान.
मेले के जरिये विश्व सिनेमा की पड़ताल कर रही हैं सिनेमा अध्येता अमृता सिंह
पिछले कुछ समय से दुनिया भर में जेन-जी द्वारा किए जाने वाले विद्रोह चर्चा का विषय बने हुए हैं. यह इतिहास की पहली ऐसी पीढ़ी है जो पूरी तरह से डिजिटल क्रांति, स्मार्टफोन, हाई-स्पीड इंटरनेट और एआई के माहौल में पली-बढ़ी है. पुरानी पीढ़ियों के लिए ‘फासले’ का मतलब शारीरिक दूरी होता था, लेकिन जेन-जी के दौर में एक ही कमरे में बैठकर भी लोग अपने-अपने स्क्रीन्स में खोए रहते हैं, जिससे रिश्तों में एक नया ‘मौन फासला’ पैदा हो गया है.
पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच तेजी से आए बदलावों की पड़ताल कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र
ड्रोन की दुनिया का इतिहास एक गुब्बारे में रखे बम से शुरू होकर आज आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से लैस होकर उड़ने वाले गैजेट्स तक पहुंच चुका है. पिछले सौ से अधिक सालों में ड्रोन, जिन्हें तकनीकी भाषा में यूएवी (अनमैन्ड एरियल वेहिकल) यानी मानव रहित हवाई वाहन कहा जाता है, आज सिर्फ आसमान में उड़ने वाला एक खिलौना नहीं है, बल्कि रक्षा प्रणाली, कृषि और लॉजिस्टिक्स का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है.
पुराने जमाने से लेकर अत्याधुनिक दौर तक ड्रोन के समग्र इतिहास के बारे में जानकारी दे रहे हैं विज्ञान लेखक अभिषेक कुमार सिंह
मेचुका, जिसे ‘अरुणाचल प्रदेश का छिपा हुआ स्वर्ग’ (हिडेन शांगरी-ला) भी कहा जाता है, भारत-चीन (तिब्बत) सीमा से महज 29 किलोमीटर दूर शी-योमी जिले में लगभग छह हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित एक बेहद खूबसूरत और दुर्गम घाटी है. बर्फ से ढकी चोटियां, विशाल घास के मैदान, तैरते बादल और बीच से बहती कांच जैसी साफ सियोम नदी इस जगह को धरती का स्वर्ग बनाती है.
मेचुका की इस मनोहारी यात्रा पर ले चल रहे हैं लोकमत समाचार के वरिष्ठ संपादक विकास मिश्र
ब्रिटेन हमारे लिए केवल एक देश का नाम नहीं था. वह इतिहास की उन धुंधली परंतु जिद्दी स्मृतियों का हिस्सा था, जिन्हें हमने बचपन से किताबों में पढ़ा था. लगभग तीन सौ वर्षों तक भारत के साथ उसका रिश्ता रहा और करीब दो सदियों तक उसने इस देश पर शासन किया. इसलिए ब्रिटेन के साथ हमारा संबंध कभी सीधा और सरल नहीं रहा. उसमें आकर्षण भी था और आक्रोश भी; निकटता भी और दूरी भी; एक विचित्र-सा प्रेम भी और उतनी ही गहरी घृणा भी.
ब्रिटेन की यात्रा का अपना संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार अरुण सिंह
डॉ. भूपेन हजारिका असमिया संस्कृति के एक अद्वितीय प्रतीक, संगीतकार, गायक, कवि और फिल्म निर्माता थे. उन्हें बहुमुखी प्रतिभा के कारण ‘असमिया संस्कृति के सम्राट’ और ‘सुधाकंठ’ (यानी मीठे गले वाला) कहा जाता है. उन्होंने असमिया लोक संगीत और संस्कृति को न केवल भारत में, बल्कि पूरे विश्व पटल पर एक नई पहचान दिलाई.
डॉ. भूपेन हजारिका के शताब्दी जयंती वर्ष पर उनकी जीवनगाथा के अनोखे रोचक पहलओं की जानकारी दे रहे हैं वरिष्ठ लेखक श्रीराम पुकार शर्मा
