किस्सागोई और कहानियों की दुनिया से खुद को जोड़ने का कोई ठिकाना है, तो वह जगह कॉफी हाउस से बेहतर शायद ही दूसरी कोई हो. 1738 में एक ईरानी दरगाह कुली खान ने अपनी किताब ‘मरक़-ए-दिल्ली’ में ऐसे ही ठिकाने का बड़ी खूबसूरती से जिक्र किया है.
वे लिखते हैं, ‘‘चांदनी चौक के आसपास कई कहवाखाने (कॉफी हाउस) हैं, जहां शायर अपनी ताजी रचनाओं को सुनाकर वाहवाही लूटने में लगे हैं. शहर के रईस अपनी हैसियत की परवाह किए बगैर अपने को यहां आने से रोक नहीं पाते. ये कहवाखाने (कॉफी हाउस) शायरों, लेखकों और कलाकारों से हमेशा भरे हुए रहते हैं. मुगल दरबार के इतिहासकार और शायर आनंदराम मुख्लिस अक्सर कॉफी हाउस में दिख जाते हैं. यद्यपि वे घर पर भी अपने दोस्तों का कहवा से स्वागत करते हैं’’
- अरुण सिंह
रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण, नहीं पहचाना. रेखाओं के महानायक आर.के. लक्ष्मण का यह पूरा नाम है. पढ़ने-लिखने से जी चुरानेवाले लक्ष्मण को बचपन से शौक एक ही था-घर में जहां भी खाली जगह दिखती, रेखाचित्र बनाने लग जाते.
दीवार, फर्श, दरवाज़े, खिड़कियां-सभी पर वे रेखाओं का हुनर दिखाते रहते. मां के कहने पर स्नातक तक पढ़ाई, तो कर ली लेकिन एक अदद नौकरी की तलाश थोड़ी लंबी चली. अपने सफर की शुरुआत बड़े और नामचीन अखबार या मीडिया हाउस से करने की थी लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया और दोस्त के परिचय से स्थानीय अखबार के दफ्तर जा पहुंचे. इस तरह 50 रुपए वेतन पर काम शुरू कर दिया. यह उस समाचारपत्र के कर्मचारियों को मिलनेवाला अधिकतम वेतन में शामिल था.
- राजेश बादल
मौसम का रुख कई दिनों से खराब था. सुदूर चीन-भारत बॉर्डर बुमला पास से गुवाहाटी लौटते हुए हमें बोमडिला से ठीक पहले खबर मिली कि भालुकपॉन्ग के पास लैंड स्लाइड हो गई है यानी पहाड़ धसक गया है और हम भालुकपॉन्ग नहीं पहुंच पाएंगे.
अरुणाचल की सड़कों पर यह कोई नई बात नहीं है. पता नहीं कब कहां पहाड़ धसक जाए और रास्ता जाम! सवाल था कि अब क्या करें? भालुकपॉन्ग में हमारी बुकिंग थी. मुझे खयाल आया कि रूपा होकर एक सड़क गुवाहाटी जाती है लेकिन पहाड़ में शाम जल्दी हो जाती है और सड़कों पर रफ्तार नहीं मिलती इसलिए शाम ढलने से पहले गुवाहाटी पहुंचना संभव नहीं था. पिछली बार मैं उसी सड़क से लौटा था और अंदाजा था कि उस मार्ग पर कोई ऐसा छोटा सा शहर भी नहीं है कि रुकने की व्यवस्था हो पाए.
- विकास मिश्र
‘‘ब्यूटी चौरसिया का ऐलान-वोट तुमको नहीं देंगे सरकार. ’’ दातापुर कस्बे के स्थानीय अखबारों में खबर छपी थी, स्थानीय यूट्यूबर जोर-जोर से सनसनीखेज खबर फैला रहे थे मानों किसी पार्टी ने गठबंधन की सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा की हो.
बात ही कुछ ऐसी थी. केंद्र सरकार के एक फैसले ने ब्यूटी का दिमाग हिलाकर रख दिया था. उसका मनोरंजक संसार जिससे आर्थिक लाभ हो रहा था, वह पूरा सहारा छिन गया था. टिकटॉक एप्प पर भारत में पाबंदी लगाने की खबरें आ रही थीं. टिकटॉक क्वीन, टिकटॉक डार्लिंग नाम से मशहूर ब्यूटी चौरसिया एकदम से चौराहे पर आ खड़ी हुई थी. उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया था. थिरकते कदम थम गए थे. वो लड़की जो समूची पृथ्वी को नृत्य मंच बना कर अपना लोहा मनवा चुकी थी, खेत-खलिहान, बड़े-बुजुर्ग सब उसकी ताल पर नाचने लगे थे, गांव का माहौल बदल दिया था, अब उसके कदम थम गए थे.
- गीताश्री
‘खिड़कियां खोल दो, थोड़ी रोशनी और हवा आ जाएगी, सीलन से भरा है घर...’ कहते हुए वो पीछे का दरवाजा खोल कर आंगन में धूप सेंकने चला गया.
‘कमरे की रोशनी से ज्यादा अच्छा होती है मन की रोशनी’ सोचते हुए मैंने उठकर खिड़की खोल दी, जिसके एक पट से भरभरा कर धूप के टुकड़े कमरे में बिखर गए. मेज पर रखी किताब के पन्ने फड़फड़ा उठे. मन की किताब में कुछ अक्षर और शब्द झिलमिलाए और बुझ गए...शब्द और अक्षर लिखने के लिए अब पन्नों की क्या जरूरत... अब कम्प्यूटर का एक स्क्रीन है, जिस पर जो चाहो फटाफट लिख लो...मैं लिखना चाहती हूं जिंदगी की इबारत. मैं लिखना चाहती हूं वो सब जो मैं करना चाहती थी, मैं लिखना चाहती हूं अपने सपनों की आवाज, अनुगूंज लेकिन अचानक स्क्रीन काला हो कर बंद हो जाता है, मैं अपने मन की अतल गहराई से बाहर छिटक कर गिर जाती हूं.
- ममता सिंह
भारतीय क्रिकेट के 100 से अधिक वर्षों के सफर में देश के अनेक दिग्गज क्रिकेटरों की कड़ी मेहनत और प्रतिभा की अहम भूमिका रही है. हालांकि क्रिकेट के विश्व पटल पर भारत का रुतबा रातोंरात नहीं बढ़ा.
इसके लिए भारतीय क्रिकेट ने लंबा संघर्षपूर्ण सफर तय किया है. इसके लिए भारतीय क्रिकेट ने लंबा संघर्षपूर्ण सफर तय किया है. भारतीय क्रिकेट के 100 से अधिक वर्षों के सफर में देश के अनेक दिग्गज क्रिकेटरों की कड़ी मेहनत और प्रतिभा की अहम भूमिका रही है. 90 के दशक की शुरुआत में दो दिग्गज भारतीय क्रिकेटरों-महाराजा रणजीत सिंहजी और दलीप सिंहजी ने इंग्लैंड की टीम का प्रतिनिधित्व किया था. भारतीय क्रिकेट की शुरुआत की कहानी बड़ी रोचक रही है.
- डॉ. राम ठाकुर
महाराष्ट्रीयन क्रिकेटरों को आप देखें तो उनमें लड़ाकूपन नहीं दिखेगा. वे विरोधी टीम द्वारा की जा रही स्लेजिंग के जाल में नहीं फंसते. अपितु ‘टिट फॉर टैट’ की जगह ‘गांधीगीरी’ का ही रास्ता चुनते हैं.
वह न तो किसी से कोई ‘पंगा’ लेते हैं और न किसी को उकसाते हैं. सच्ची खेल भावना से खेलते हैं और उनकी इसी प्रवृत्ति के मुफीद यह खेल भी है, जिसमें खासकर फुटबॉल की तरह आक्रामकता कभी नहीं दिखी. क्रिकेट में विकेट का जश्न जरूर चलता है लेकिन इसमें वह ‘आग’ या उस स्तर की ‘उत्तेजना’ नहीं होती जो फुटबॉल में होती है. पिछले 40 सालों में सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर समेत स्व. अंशुमन गायकवाड़, रोहित शर्मा, दिलीप वेंगसरकर, रवि शास्त्री, संदीप पाटिल, अजिंक्य रहाणे, संजय मांजरेकर आदि महाराष्ट्रीयन क्रिकेटरों को हमने देखा है. इनमें रवि शास्त्री और रोहित शर्मा अपवाद हैं जो अपनी बिंदास शैली के लिए परिचत हैं लेकिन याद नहीं आता कि मैदान पर वह भी कभी किसी से उलझे हों.
-रवींद्र चोपड़े
भारतीय क्रिकेट का फिल्मों से रिश्ता पुराना, कथानक से लेकर कलाकार और इश्क से लेकर शादियों तक खत्म न होने वाली कहानियां बदस्तूर जारी हैं.
इतिहास में आजादी के बाद से और देसी सिनेमा के सौ साल से ज्यादा के इतिहास में आजादी के बाद शायद ही कोई ऐसा साल बीता हो, शायद ही कोई ऐसा साल बीता हो, जब फिल्मों का क्रिकेट से नाता न जुड़ा हो. यहां तक कि जब फिल्में नहीं बनीं तो कलाकार कभी मैदान पर तो कभी दर्शक दीर्घा में बैठे दिखे, किंतु क्रिकेट से परे कभी नहीं रहे. साल 1959 में देव आनंद अभिनीत ‘लव मैरिज’ से हुई का फिल्मी सिलसिला आज भी जारी है.
- अमिताभ श्रीवास्तव
गेंद, बल्ला, स्टम्प, पिच, हराभरा मैदान और दोनों टीमों के कुल जमा 22 खिलाड़ी. भारत में इतनाभर क्रिकेट नहीं है. यहां क्रिकेट के मायने बदल जाते हैं, क्रिकेटप्रेमियों का दृष्टिकोण बदल जाता है और खिलाड़ी भी अपेक्षाओं का बोझ लिए चलते हैं.
इस धरती पर भारत संभवत: एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जहां क्रिकेट धर्म है. 140 करोड़ से अधिक की आबादी, अनेक भाषाएं, कई तरह की संस्कृतियां, कई तरह की वेशभूषाएं, आचार-विचारों में तफावत, खानपान में जमीन-आसमान का अंतर. इतनी विसंगतियों से परे भारतवर्ष को क्रिकेट एकसूत्र में पिरो देता है. जात-पात, खान-पान, रहन-सहन के भेद की जंजीरें उस समय अपने आप पिघलने लगती हैं जब हमारा भारत किसी मुकाबले में फतह का सेहरा बांधने की दिशा में अग्रसर हो जाता है. किसी की निगाहों में भारत क्रिकेट के अतिवाद का शिकार है, जबकि कुछ इसे देश में उमंग-उत्साह जगाने का पहलू निरूपित कर रहे हैं.
- किशोर बागड़े
किस्सागोई और कहानियों की दुनिया से खुद को जोड़ने का कोई ठिकाना है, तो वह जगह कॉफी हाउस से बेहतर शायद ही दूसरी कोई हो. 1738 में एक ईरानी दरगाह कुली खान ने अपनी किताब ‘मरक़-ए-दिल्ली’ में ऐसे ही ठिकाने का बड़ी खूबसूरती से जिक्र किया है.
वे लिखते हैं, ‘‘चांदनी चौक के आसपास कई कहवाखाने (कॉफी हाउस) हैं, जहां शायर अपनी ताजी रचनाओं को सुनाकर वाहवाही लूटने में लगे हैं. शहर के रईस अपनी हैसियत की परवाह किए बगैर अपने को यहां आने से रोक नहीं पाते. ये कहवाखाने (कॉफी हाउस) शायरों, लेखकों और कलाकारों से हमेशा भरे हुए रहते हैं. मुगल दरबार के इतिहासकार और शायर आनंदराम मुख्लिस अक्सर कॉफी हाउस में दिख जाते हैं. यद्यपि वे घर पर भी अपने दोस्तों का कहवा से स्वागत करते हैं’’
- अरुण सिंह
रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण, नहीं पहचाना. रेखाओं के महानायक आर.के. लक्ष्मण का यह पूरा नाम है. पढ़ने-लिखने से जी चुरानेवाले लक्ष्मण को बचपन से शौक एक ही था-घर में जहां भी खाली जगह दिखती, रेखाचित्र बनाने लग जाते.
दीवार, फर्श, दरवाज़े, खिड़कियां-सभी पर वे रेखाओं का हुनर दिखाते रहते. मां के कहने पर स्नातक तक पढ़ाई, तो कर ली लेकिन एक अदद नौकरी की तलाश थोड़ी लंबी चली. अपने सफर की शुरुआत बड़े और नामचीन अखबार या मीडिया हाउस से करने की थी लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया और दोस्त के परिचय से स्थानीय अखबार के दफ्तर जा पहुंचे. इस तरह 50 रुपए वेतन पर काम शुरू कर दिया. यह उस समाचारपत्र के कर्मचारियों को मिलनेवाला अधिकतम वेतन में शामिल था.
- राजेश बादल
मौसम का रुख कई दिनों से खराब था. सुदूर चीन-भारत बॉर्डर बुमला पास से गुवाहाटी लौटते हुए हमें बोमडिला से ठीक पहले खबर मिली कि भालुकपॉन्ग के पास लैंड स्लाइड हो गई है यानी पहाड़ धसक गया है और हम भालुकपॉन्ग नहीं पहुंच पाएंगे.
अरुणाचल की सड़कों पर यह कोई नई बात नहीं है. पता नहीं कब कहां पहाड़ धसक जाए और रास्ता जाम! सवाल था कि अब क्या करें? भालुकपॉन्ग में हमारी बुकिंग थी. मुझे खयाल आया कि रूपा होकर एक सड़क गुवाहाटी जाती है लेकिन पहाड़ में शाम जल्दी हो जाती है और सड़कों पर रफ्तार नहीं मिलती इसलिए शाम ढलने से पहले गुवाहाटी पहुंचना संभव नहीं था. पिछली बार मैं उसी सड़क से लौटा था और अंदाजा था कि उस मार्ग पर कोई ऐसा छोटा सा शहर भी नहीं है कि रुकने की व्यवस्था हो पाए.
- विकास मिश्र
‘‘ब्यूटी चौरसिया का ऐलान-वोट तुमको नहीं देंगे सरकार. ’’ दातापुर कस्बे के स्थानीय अखबारों में खबर छपी थी, स्थानीय यूट्यूबर जोर-जोर से सनसनीखेज खबर फैला रहे थे मानों किसी पार्टी ने गठबंधन की सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा की हो.
बात ही कुछ ऐसी थी. केंद्र सरकार के एक फैसले ने ब्यूटी का दिमाग हिलाकर रख दिया था. उसका मनोरंजक संसार जिससे आर्थिक लाभ हो रहा था, वह पूरा सहारा छिन गया था. टिकटॉक एप्प पर भारत में पाबंदी लगाने की खबरें आ रही थीं. टिकटॉक क्वीन, टिकटॉक डार्लिंग नाम से मशहूर ब्यूटी चौरसिया एकदम से चौराहे पर आ खड़ी हुई थी. उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया था. थिरकते कदम थम गए थे. वो लड़की जो समूची पृथ्वी को नृत्य मंच बना कर अपना लोहा मनवा चुकी थी, खेत-खलिहान, बड़े-बुजुर्ग सब उसकी ताल पर नाचने लगे थे, गांव का माहौल बदल दिया था, अब उसके कदम थम गए थे.
- गीताश्री
‘खिड़कियां खोल दो, थोड़ी रोशनी और हवा आ जाएगी, सीलन से भरा है घर...’ कहते हुए वो पीछे का दरवाजा खोल कर आंगन में धूप सेंकने चला गया.
‘कमरे की रोशनी से ज्यादा अच्छा होती है मन की रोशनी’ सोचते हुए मैंने उठकर खिड़की खोल दी, जिसके एक पट से भरभरा कर धूप के टुकड़े कमरे में बिखर गए. मेज पर रखी किताब के पन्ने फड़फड़ा उठे. मन की किताब में कुछ अक्षर और शब्द झिलमिलाए और बुझ गए...शब्द और अक्षर लिखने के लिए अब पन्नों की क्या जरूरत... अब कम्प्यूटर का एक स्क्रीन है, जिस पर जो चाहो फटाफट लिख लो...मैं लिखना चाहती हूं जिंदगी की इबारत. मैं लिखना चाहती हूं वो सब जो मैं करना चाहती थी, मैं लिखना चाहती हूं अपने सपनों की आवाज, अनुगूंज लेकिन अचानक स्क्रीन काला हो कर बंद हो जाता है, मैं अपने मन की अतल गहराई से बाहर छिटक कर गिर जाती हूं.
- ममता सिंह
भारतीय क्रिकेट के 100 से अधिक वर्षों के सफर में देश के अनेक दिग्गज क्रिकेटरों की कड़ी मेहनत और प्रतिभा की अहम भूमिका रही है. हालांकि क्रिकेट के विश्व पटल पर भारत का रुतबा रातोंरात नहीं बढ़ा.
इसके लिए भारतीय क्रिकेट ने लंबा संघर्षपूर्ण सफर तय किया है. इसके लिए भारतीय क्रिकेट ने लंबा संघर्षपूर्ण सफर तय किया है. भारतीय क्रिकेट के 100 से अधिक वर्षों के सफर में देश के अनेक दिग्गज क्रिकेटरों की कड़ी मेहनत और प्रतिभा की अहम भूमिका रही है. 90 के दशक की शुरुआत में दो दिग्गज भारतीय क्रिकेटरों-महाराजा रणजीत सिंहजी और दलीप सिंहजी ने इंग्लैंड की टीम का प्रतिनिधित्व किया था. भारतीय क्रिकेट की शुरुआत की कहानी बड़ी रोचक रही है.
- डॉ. राम ठाकुर
महाराष्ट्रीयन क्रिकेटरों को आप देखें तो उनमें लड़ाकूपन नहीं दिखेगा. वे विरोधी टीम द्वारा की जा रही स्लेजिंग के जाल में नहीं फंसते. अपितु ‘टिट फॉर टैट’ की जगह ‘गांधीगीरी’ का ही रास्ता चुनते हैं.
वह न तो किसी से कोई ‘पंगा’ लेते हैं और न किसी को उकसाते हैं. सच्ची खेल भावना से खेलते हैं और उनकी इसी प्रवृत्ति के मुफीद यह खेल भी है, जिसमें खासकर फुटबॉल की तरह आक्रामकता कभी नहीं दिखी. क्रिकेट में विकेट का जश्न जरूर चलता है लेकिन इसमें वह ‘आग’ या उस स्तर की ‘उत्तेजना’ नहीं होती जो फुटबॉल में होती है. पिछले 40 सालों में सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर समेत स्व. अंशुमन गायकवाड़, रोहित शर्मा, दिलीप वेंगसरकर, रवि शास्त्री, संदीप पाटिल, अजिंक्य रहाणे, संजय मांजरेकर आदि महाराष्ट्रीयन क्रिकेटरों को हमने देखा है. इनमें रवि शास्त्री और रोहित शर्मा अपवाद हैं जो अपनी बिंदास शैली के लिए परिचत हैं लेकिन याद नहीं आता कि मैदान पर वह भी कभी किसी से उलझे हों.
-रवींद्र चोपड़े
भारतीय क्रिकेट का फिल्मों से रिश्ता पुराना, कथानक से लेकर कलाकार और इश्क से लेकर शादियों तक खत्म न होने वाली कहानियां बदस्तूर जारी हैं.
इतिहास में आजादी के बाद से और देसी सिनेमा के सौ साल से ज्यादा के इतिहास में आजादी के बाद शायद ही कोई ऐसा साल बीता हो, शायद ही कोई ऐसा साल बीता हो, जब फिल्मों का क्रिकेट से नाता न जुड़ा हो. यहां तक कि जब फिल्में नहीं बनीं तो कलाकार कभी मैदान पर तो कभी दर्शक दीर्घा में बैठे दिखे, किंतु क्रिकेट से परे कभी नहीं रहे. साल 1959 में देव आनंद अभिनीत ‘लव मैरिज’ से हुई का फिल्मी सिलसिला आज भी जारी है.
- अमिताभ श्रीवास्तव
गेंद, बल्ला, स्टम्प, पिच, हराभरा मैदान और दोनों टीमों के कुल जमा 22 खिलाड़ी. भारत में इतनाभर क्रिकेट नहीं है. यहां क्रिकेट के मायने बदल जाते हैं, क्रिकेटप्रेमियों का दृष्टिकोण बदल जाता है और खिलाड़ी भी अपेक्षाओं का बोझ लिए चलते हैं.
इस धरती पर भारत संभवत: एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जहां क्रिकेट धर्म है. 140 करोड़ से अधिक की आबादी, अनेक भाषाएं, कई तरह की संस्कृतियां, कई तरह की वेशभूषाएं, आचार-विचारों में तफावत, खानपान में जमीन-आसमान का अंतर. इतनी विसंगतियों से परे भारतवर्ष को क्रिकेट एकसूत्र में पिरो देता है. जात-पात, खान-पान, रहन-सहन के भेद की जंजीरें उस समय अपने आप पिघलने लगती हैं जब हमारा भारत किसी मुकाबले में फतह का सेहरा बांधने की दिशा में अग्रसर हो जाता है. किसी की निगाहों में भारत क्रिकेट के अतिवाद का शिकार है, जबकि कुछ इसे देश में उमंग-उत्साह जगाने का पहलू निरूपित कर रहे हैं.
- किशोर बागड़े
किस्सागोई और कहानियों की दुनिया से खुद को जोड़ने का कोई ठिकाना है, तो वह जगह कॉफी हाउस से बेहतर शायद ही दूसरी कोई हो. 1738 में एक ईरानी दरगाह कुली खान ने अपनी किताब ‘मरक़-ए-दिल्ली’ में ऐसे ही ठिकाने का बड़ी खूबसूरती से जिक्र किया है.
वे लिखते हैं, ‘‘चांदनी चौक के आसपास कई कहवाखाने (कॉफी हाउस) हैं, जहां शायर अपनी ताजी रचनाओं को सुनाकर वाहवाही लूटने में लगे हैं. शहर के रईस अपनी हैसियत की परवाह किए बगैर अपने को यहां आने से रोक नहीं पाते. ये कहवाखाने (कॉफी हाउस) शायरों, लेखकों और कलाकारों से हमेशा भरे हुए रहते हैं. मुगल दरबार के इतिहासकार और शायर आनंदराम मुख्लिस अक्सर कॉफी हाउस में दिख जाते हैं. यद्यपि वे घर पर भी अपने दोस्तों का कहवा से स्वागत करते हैं’’
- अरुण सिंह