
सरेआम कोई लड़की आपसे कहती है ‘आप इतने स्मार्ट क्यों हो?’ उसकी अदा पर आप निछावर हो जाना चाहते हैं. रंगीनियत की यह दुनिया तेजी से आपको अपने आगोश में लेने लगती है...आप होश खोने लगते हैं...!
दिन में उन सड़कोें की सैर करें तो एक सामान्य बाजार नजर आता है. ऐसा बाजार जिसमें आप हो सकता है कि रूखापन महसूस करें लेकिन शाम ढलते ही वहां दुनिया बदल जाती है. हर ओर देह हावी हो जाती है. इसकी देह...उसकी देह...पता नहीं किस-किस की देह! देह ही देह! देह यानी शरीर. यह बाजार शरीर का है, बदन का है! यह सेक्स की मंडी है. बदन खरीदा जा रहा है, बदन बिक रहा है. आपकी जेब में जितनी ताकत है, उतने बदन आप खरीद सकते हैं. इस बाजार में कोई रोकटोक नहीं है!
इसी रंगीनियत का नतीजा है कि करीब 7 करोड़ की आबादी वाले इस छोटे से देश थाईलैंड की सैर के लिए दुनिया भर से कोई साढ़े तीन करोड़ लोग हर साल पहुंचते हैं. निश्चय ही थाईलैंड की खूबसूरती भी लोगों को आकर्षित करती है लेकिन हकीकत तो यही है कि यहां सेक्स इंडस्ट्री आकर्षण का सबसे बड़ा फैक्टर है. इस आकर्षण में ज्यादा लोग खिंचे चले आते हैं. थाईलैंड पहुंचने वाले पर्यटकों की संख्या के मामले में चीन, मलेशिया, कोरिया और लाओस के बाद पांचवें क्रम पर भारत ही है. पिछले साल करीब-करीब 15 लाख भारतीयों ने थाईलैंड की सैर की.
मैं जिन रंगीन सड़कों की बात कर रहा हूं वहां रात जैसे-जैसे ढलती है, सेक्स का उन्माद बढ़ता चला जाता है. आधी रात के भी देर बाद जब संगीत की महफिल थम जाती है तब भी इन सड़कों का रोमांच खत्म नहीं होता. फिर सड़कों पर कब्जा होता है फ्रीलांसर्स का. यह नाम उन लड़कियों और लेडीब्वाय के लिए है जो किसी बार या महफिल-घर से जुड़ी नहीं होती हैं. वे अपना सौदा खुद करती हैं. जो जितनी खूबसूरत, उसकी कीमत उतनी ही ज्यादा! भोर होने से पहले तक का माहौल बिल्कुल आवारा किस्म का होता है और इसी दौरान मदहोशी के आगोश में पहुंच गए पर्यटक कई बार लुट भी जाते हैं.
- विकास मिश्र
पुलिस और शासक वर्ग, जिनके नाम से आम लोगकांपते थे, वे सुल्ताना के नाम से आतंकित हो जाते थे. वही सुल्ताना गांव-गांव में किस्से कहानियों का नायक भी बना. आखिर क्या थी उसकी हकीकत...?
भेष बदलने में माहिर सुल्ताना डाकू के किस्से-कहानियों की भरमार है. कभी वह अंग्रेज अफसरों को मूर्ख बनाकर निकल जाता तो कहीं पुलिस का अधिकारी या कुछ और बन जाता. भेष बदलकर कई बार गरीब और बेसहारा परिवारों की वह मदद करता रहता था. तमाम इलाकों में गरीब परिवार की बेटी की शादी से लेकर तमाम कामों में वह मदद को आगे रहता. कहीं वह साधु के भेष में पहुंच जाता तो कहीं साहूकार के भेष में. बाद में तलाश कर पुलिस पहुंचती तब तक सुल्ताना हाथ से निकल जाता. सुल्ताना कई बार आला-अफसरों से मिल कर आ जाता तो कई बार नाई बनकर हजामत तक बना आता. वह कहीं धोखे से वार नहीं करता था. आज भी उत्तरी भारत के तमाम गांवों में सुल्ताना डाकू लोकजीवन में विद्यमान है. उस पर बहुत कुछ लोक साहित्य उपलब्ध है, जो बताता है कि वह कितना लोकप्रिय था. फिर भी उससे जुड़े बहुत से तथ्यों के पन्ने अनखुले ही हैं. अंग्रेज अफसरों की निगाह में अगर वह खूंखार डाकू था तो जिम कार्बेट की निगाह में भारत का राबिनहुड.
- अरविंद कुमार सिंह
देश की सुरक्षा का एक बेहद अहम हिस्सा हमारी वायुसेना के पंखों पर है. 1932 में 6 भारतीय अधिकारी, 19 हवाई सिपाहियों और चार वेस्टलैंड वापिती दो पंखों के जहाजों के साथ यह कारवां धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाता गया.
भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के भीतर जाकर जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी कैंपों को हवाई हमले में नेस्तनाबूद करने में सफलता हासिल की है. यह जीत भारतीय वायुसेना की है. यह आॅपरेशन जिस तेजी के साथ रात के आखिरी पहर में लगभग साढ़े तीन बजे के बाद किया गया, इस बात को दर्शाता है कि भारतीय हवाई जहाजों को पाकिस्तानी वायुसेना न रोक पाई, न किसी किस्म का नुकसान कर पाई. वायुसेना के 12 मिराज 2000 हवाई जहाजों ने ग्वालियर से उड़ान भरी थी और बम बरसा कर सकुशल वापस आ गए थे. तीन आतंकी कैंप - बालाकोट, मुजफ्फराबाद और चकोटी पर 6 लेजर गाइडेड बमों से बर्बादी की है. नीची उड़ान के साथ दुश्मन के इलाके में घुसना, रडार की पकड़ से दूर और अपने टारगेट पर आक्र मण कर वापस सकुशल आना एक ऐतिहासिक विजय है.
भारतीय वायुसेना इस किस्म की पहुंच में शायद हर बार कामयाब न हो सके, इस बात का हमें इल्म रखना होगा. लेकिन यदि जरूरत पड़े तो हमारे पायलट इस किस्म की घुसपैठ के लिए हमेशा तैयार रहेंगे. दुश्मन अब चौकस रहेगा यह भी उतना ही सत्य है. नए किस्म के बम और मिसाइलों की जरूरत रहेगी जिसकी बदौलत हम दूर से ही दुश्मन के आतंकी कैंपों को निशाना बना सकें. प्रशिक्षण में पैनापन लाना आवश्यक है. आने वाला साल बेहद कठिन होने की संभावना है. बर्फ पिघलने के बाद सीमा पार से आतंकियों का हमारी सीमा में घुसना लाजमी है. भारतीय वायुसेना को हर हाल में अपने अग्रिम मोर्चों पर सचेत रहना होगा.
- सारंग थत्ते
देश और विदेश में वाहनों की एक अलग दुनिया है, जिसमें हर समय एक नए वाहन का इंतजार रहता है. मगर इस बदले माहौल के बीच भी कुछ लोग पुराने वाहनों को पूरी लगन के साथ संभाल ही नहीं रहे हैं, बल्कि उनके संरक्षण और पहचान को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
बदलती तकनीक, ब्रांड, नए वाहन निर्माताओं के साथ निश्चित ही पुराने वाहनों को संभालना कठिन शौक है. यदि मन में विचार आया भी तो उसे शिद्दत के साथ पूरा कर पाना आसान नहीं है. इस मामले में दिल्ली के इस अपनी किस्म के अलग क्लब के सदस्य कुछ अलग ही फितरत के लोग हैं, जो हर मुश्किल का सामना करते हुए दुपहिया वाहन अपने पास संभालते हैं और उन्हें शान के साथ लेकर देश की राजधानी की सड़कों पर निकलते हैं. यहां तक कि देश भर में उनका एक ‘नेटवर्क’ काम करता है, जो पुराने वाहन और उनके कल-पुर्जों की जानकारी देता रहता है.
‘कैपिटल स्कूटर क्लब’ के विस्तार से बने ‘विंटेज टू व्हीलर क्लब’ की शुरुआत वर्ष 2014 में स्कूटरों के शौकीन शुभम शर्मा और अमित सिंह बेदी के साथ हुई थी, जिनके दिमाग में पुराने और भुला दिए गए स्कूटरों को दोबारा आकर्षण का केंद्र बनाने का ख्याल आया. उनका मानना था कि पुराने दोपहिया वाहन कभी समाज में अपनी अलग पहचान रखते थे, किंतु आधुनिकता की दौड़ में वे तस्वीरों में ही सिमट कर रह गए. इसी सोच के साथ स्कूटर प्रेमियों को जोड़ने का सिलसिला आरंभ हुआ और अब तक सौ से अधिक लोग विभिन्न प्रकार के दोपहिया वाहनों के साथ क्लब से जुड़ चुके हैं
- अमिताभ श्रीवास्तव
राजा रवि वर्मा के रंगों, लकीरों के बीच की ‘खाली जगहों’ को खोजते हुए यक्षी के जंगल की पगडंडियों की यायावरी
राजा रवि वर्मा कौन, इस सवाल का जवाब आज भारत का आम आदमी भी दे सकता है. पौने दो सौ साल पहले जन्मे रवि वर्मा के नाम के साथ ‘विख्यात चित्रकार’ जैसी उपाधि तक लगाने की जरूरत महसूस नहीं होती. यही उनके अजर-अमर होने की निशानी है. भारतीय पौराणिक गाथाओं के देवी-देवताओं को ‘चेहरा’ देने वाले. एक ही वक्त में उनके बनाए चित्र धनकुबेरों के आलीशान बंगलों से लेकर आम आदमी के पूजाघर तक देखे जा सकते थे. ऐसे थे राजा रवि वर्मा. भारत के पहले आधुनिक चित्रकार.
रवि वर्मा की जिंदगी का सफर शुरू होता है किलिमानूर में. केरल का एक छोोटा सा सुंदर गांव. वहीं उन्होंने जन्म लिया और वहीं उनका निधन भी हुआ.
किलिमानूर की अपनी भी एक कहानी है. रवि वर्मा के जन्म से कई सदियों पहले की. मौत के सवा सौ साल बाद भी रवि वर्मा की कहानी खत्म नहीं हुई है. किलिमानूर की भी नहीं.
लोग किलिमानूर जाते हैं. रवि वर्मा के स्टूडियो में पैर रखने से पहले चौखट की मिट्टी को उठाकर माथे पर लगाते हैं. ठीक किसी मंदिर में प्रवेश की तरह. कुछ लोग तो ईजल पर मौजूद रवि वर्मा के फोटो के आगे नतमस्तक हो जाते हैं. भारतीय पुराणों के देवताओं को चेहरे देने वाले रवि वर्मा के इर्द-गिर्द रहस्य और दंतकथाओं का जाल आज भी जस का तस है.
भारतीय चित्रकला के इतिहास को आधुनिक मोड़ देने वाले राजा रवि वर्मा. पहले व्यावसायिक, उद्यमी चित्रकार. नई दुनिया के नये संकेतों को आत्मसात कर पूरी देश की पदयात्रा करने वाले.
इस यायावरी को अपनी पेंटिंग्स में पूरी समझ के साथ रंग-रूप-आकार देने वाले. अपने बड़े-बड़े कैनवास रईसों की हवेलियों की दीवाररों पर सजाने के दौरान ही सर्वसामान्य व्यक्तियों के लिए अपनी पेंटिंग्स के प्रिंट्स उपलब्ध कराने की खातिर अलग प्रिंटिंग प्रेस स्थापित करने वाले. चित्रकला को बेचने के आरोपों सहित कई लांछन झेलने के बाद भी वह अपनी राह से नहीं डिगे.
किलिमानूर से जिद करके बाहर निकले, लेकिन अपने अंतिम वक्त में फिर अपने ही गांव का आसरा लिया.
पौने दो सौ साल पहले, केरल के एक कोने में, बेहद कर्मठ, पारंपरिक माहौल के बीच, शेष भारत में बह रही आधुनिकता की बयार से कोसों दूर, मौजूद किलिमानूर में जन्मे रवि वर्मा भला कैसे एक आधुनिक, पश्चिमी तकनीक का इस्तेमाल करने वाले चित्रकार में तब्दील होते चले गए ?
- शर्मिला फडके
बचपन में ही अपने पिता को खो देने के बाद जीवन के कठिन संघर्षों से जूझते हुए आॅस्कर पुरस्कार हासिल करने वाले प्रख्यात संगीतकार की कहानी
जब दिल में कहीं भीतर बहुत गहरे दर्द की एक टीस उभरती है,
भविष्य की अनिश्चितता के घने अंधकार को भुला पाना मुश्किल होता है,
तब संगीत और उसकी सुरलहरियांं हमेशा साथ हों तो वह भी दिलो-दिमाग को सुकून नहीं दे पातीं.
यह सच है कि मेरा संगीत दुनियाभर में फैल गया है,
लेकिन इस गाने से परे के ‘रहमान’ को कोई ज्यादा जानता ही नहीं!
इससे पहले तो वह था टपकती हुई छत वाले घर में रहने वाला एक आम इंसान,
जिसने उम्र के नौवें पड़ाव में ही पिता को गंवा दिया,
सारे सपने भुलाकर बस रोजी-रोटी की जुगाड़ में फंसा ‘दिलीप’...
मेरी कामयाबी बहुत उलझी हुई है...और नाकामयाबी भी!
बात दस साल पहले की है. वह दिन आज भी मुझे याद है...
22 फरवरी 2009 चार-चार किलो वजन और 24 कैरेट सोने की साढ़े तेरा इंच ऊंचाई वाली दो प्रतिमाएं लेकर मैं और सायरा होटल फोर सीजन पर पहुंचे तो आधी रात उलट चुकी थी. मोबाइल बाहर निकाला और भारत में मौजूद कुछ खास दोस्तों को मैसेज टाइप किया,
ह्लहङ्मल्ल ्र३. अफफह्व.बस. आगे? और क्या लिखा जाए? लिखना चाहिए भी या नहीं? उस रात जो हुआ और उससे भी परे बहुत-कुछ जो मेरे दिल में गूंज रहा था!
लॉस एंजिल्स के कोडेक थिएटर में चमक-दमक से भरपूर रंगमंच पर उस रात 81वें आॅस्कर समारोह में जो कुछ हो रहा था, उसे पूरी दुनिया देख रही थी. और उसकी ओर न केवल हॉलीवुड बल्कि भारतीय चहेतों की भी नजरें पहली बार ही गड़ी हुई थीं. उस दिन पूरी दुनिया ने हॉलीवुड के गोरे, सुंदर दमकते सितारों के बीच दो सांवले भारतीयों को समारोह में आकर सोने से सजी प्रतिमाएं बड़े अभिमान के साथ लेकर जाते हुए देखा.
बेस्ट साउंड मिक्सिंग का पुरस्कार लेते वक्त ‘ळँ्र२ ्र२ ४ल्लुी’्री५ुं’ी’ कहता हुआ सपनीली आंखों वाला रसूल पुकूटी देखा, तो कई भारतीयों को लगा मानो वह एक सपना ही देख रहे हैं.
उसके कुछ ही पलों के बाद ‘बेस्ट ओरिजिनल स्कोर’ के लिए मेरा नाम ‘ए.आर. रहमान’ लिया गया. नाम सुनकर मैं कुछ पल के लिए सुन्न सा हो गया...कुर्सी से उठते वक्त बेसाख्ता मेरे मुंह से निकला ‘ओह..’ शायद किसी ने न सुना हो, लेकिन एक ‘देसी’ कलाकार के लिए उस सभागृह में जो तालियों की गड़गड़ाहट गंूजी, उसे उस रात पूरी दुनिया ने सुना. उस रात अंग्रेजी पर ही झूल रहे सभागृह ने पहली बार एक भारतीय वाक्य सुना,
‘एल्ला पुग्ग्झम इरायवनुके...’
गॉड इज ग्रेट!
पहले आॅस्कर पुरस्कार की खुशी जज्ब भी नहीं हुई थी कि ‘बेस्ट ओरिजिनल सांग ’ के दूसरे पुरस्कार के लिए भी उसी रहमान के नाम का ऐलान हुआ, तब मेरे साथ मेरी मां है, यह केवल मुझको अकेले को महसूस हो रहा था.
...और उसके बाद, उस रात आंखें बंद करके, दोनों हाथों की मुट्ठियों को आसमान की ओर फेंकते हुए मैं खुली आवाज में गाता रहा...
रत्ती रत्ती सच्ची मैंने जान गंवाई है,
नच-नच कोयलों पर रात बिताई है,
अंखियों की नींद मैंने फूंक से उड़ाई है.
गिन-गिन तारे मैंने उंगलियां जलाई है,
- ए. आर. रहमान
नसों में जुनून भरकर लहरों को चीरने वाले समंदरी परिंदों की दुनिया का रोमांचक सफर
आइदर यू आर ए शिप्पी, आॅर यू आर नॉट ए शिप्पी!
किनारा छोड़ने के लिए होता है और समंदर जीने के लिए होता है, ऐसा जिसे लगता है, वह जहाजी!
समंदर में न डूबने वाली मछली जहाजी!
समंदर देखा हुआ न हो, जहाज का मतलब भी न समझता हो तब भी समंदर की नमकीन गंध को महसूस करते हुए, सैकड़ों मील पार कर जो किनारे पर पहुंचता है, वह जहाजी!
कई जहाजी अपनी पूरी जिंदगी में समंदर में उतरे ही नहीं क्योंकि तब तक उन्हें पानी पर तैरने वाली नाव, बेड़े या किसी भी जहाज की कल्पना तक सूझी नहीं थी. उस आदिमानव ने चार पैरों पर खड़े होकर सिर्फ लहरों को निहारने का काम किया. क्षितिज की ओर जाने वाली. किनारे से दूर. अज्ञात की ओर. लेकिन जहाजी जब समंदर को निहारता है तो वह दिल से समंदर पार करता है. इसी लज्जत ने किसी समय तैरती नाव, बेड़े, जहाज को जन्म दिया! यह लज्जत बगैर अनुभव लिए नहीं मिल सकती. पैदा होने से पहले ही जिनकी नसों में बहने वाले खून में समंदर मिला होता है और सिर में समंदरी हवा घूमती रहती है, उन्हें ही इसका एहसास होता है. इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.
मैं जब चार-पांच साल का था और अर्नाला में रहता तो पूरे गांव में तलाशने पर भी मैं न मिलंू तो तलाशने वाले समंदर पर आ जाते थे. मैं वहां जरूर मिलता था.
कॉलेज के दिनों में जैसे ही अंधेरा छा जाता तो दोस्त सबसे पहले शिवाजी पार्क के किनारे पर ढूंढने के लिए आ जाते. बीच कैफे की दीवार के पीछे. तब नहीं समझा था...लहरों पर खेलने वाले बेड़े, नाव, जहाज पर पैर रखने तक नहीं समझ पाते थे अपने भीतर के जहाजी को. सिर्फ विड्रॉल सिम्पटम्स सताते रहते हैं समंदर दिखने तक...सांस-सिर में घुसने तक... भीगने तक... लहरों पर उठाकर फेंकने तक... एंक्जायटी, डिप्रेशन यहां तक कि हैल्युसिनेशन भी.
बेचैनी सी रहती है लेकिन यह नहीं समझ पाता कि यह बेचैनी कैैसी है? निराशा मन को घेरे रखती है. आसपास की दुनिया का अस्तित्व सच है या झूठ, यह समझ में नहीं आता. भ्रम होने लगता है. चरस, गांजा, कोकीन के विड्रॉल सिम्पटम्स से भी खतरनाक होते हैं ये सिम्पटम्स! मैंने इन सभी का अनुभव लिया है. लंबे समय तक. लेकिन समंदर पूरा दिखाई दिया... किनारा छूट गया और फिर किसी भी नशे की जरूरत नहीं बची.
लहरें मारते समंदर और तेज हवाओं का जिसे नशा होता है, वह जहाजी!
चार पैरों पर चलने वाला आदिमानव दो पैरों पर चलने न लगा होता, हथियार बनाने, इस्तेमाल करने के लिए उसके हाथ खुले न होते तो? तब दुनिया के सभी जहाजियों का क्या हुआ होता? कैन यू थिंक आॅफ इट?
- अनंत सामंत
हाथियों पर जान छिड़कने वाले तथा ‘एलिफेंट व्हिसपरर आॅफ इंडिया’ के रूप में परिचित आनंद शिंदे के साथ कमलापुर के जंगलों का रोचक सफर...
‘एलिफेंट व्हिस्परर’ अर्थात ऐसा व्यक्ति जो हाथियों की ‘अनजान’ बोली को समझता है और उसी बोली में उनसे बातें कर सकता है. भारत में यह संकल्पना नई है, लेकिन कुछ देशों में चिरपरिचित हैं. ऐसे माहौल में जब एक इनसान दूसरे इनसान से ठीक से बात नहीं करता, आनंद शिंदे और हाथियों की ‘लव स्टोरी’ बेमिसाल है. आनंद शिंदे कहते हैं कि मनुष्य को मनाना जितना कठिन है; हाथियों को मनााना उतना ही आसान. मैं हाथियों से ‘बातें’ कर उनका आक्रोश शांत कर सकता हूं! हाथी जैसे भीमकाय प्राणी के मन में क्या चल रहा है, इसे कैसे पता लगाया जा सकता है? क्या यह संभव है, कोई व्यक्ति ऐसा कर सकता है, ढेर सारे सवालों से मेरा दिमाग चकरा रहा था. जब आनंद शिंदे से मिला तो उन्होंने कहा, सभी सवालों के जवाब मिलेंगे, लेकिन मेरे साथ जंगल चलना पड़ेगा! जिज्ञासा को शांत करने का दूसरा विकल्प नहीं था, सो मैं तैयार हो गया और आनंद के साथ रवाना होने की तैयारी शुरू कर दी. तड़के 5 बजे हम आनंद के वाहन में सवार होकर कमलापुर के लिए रवाना हुए. वाहन में बैठते ही मैं समझ गया कि यह व्यक्ति गाड़ी खूब तेज चलाता है. इस पर आनंद ने कहा, ‘जंगल में भ्रमण करते हुए मैं बेहद अनुशासित रहता हूं. समय बर्बाद नहीं करना चाहता, इसलिए गाड़ी स्वयं चलाता हूं.’ जैसे-जैसे गाड़ी के पहिये तेज घूमने लगे, आनंद अपनी कहानी बताने लगा.
- सुधीर लंके
सेलिब्रिटीज की निजी जिंदगी का पता लगाने मुंबई की पॉश गलियों में भटकने वाले पैपराजियों की रोमांचकारी दुनिया
बीस-बाइस मिस्ड कॉल्स, पंद्रह-सोलह टेक्स्ट मैसेजेस और प्रत्यक्ष रूप से तीन बार फोन पर संपर्क होने के बाद आखिरकार उसने मिलने का समय दिया. प्राय: ऐसी मीटिंग्स किसी कॉफी शॉप में होती हैं. लेकिन उसने मुझे मिलने के लिए बुलाया, वेस्टर्न एक्सप्रेस हाई-वे पर अधूरे बने मेट्रो के पिलर नं. 57 के नीचे और वह भी रात के पौने बारह बजे... वास्तव में उसके पास मिलने का समय नहीं था, लेकिन काफी जुगाड़ लगाने के बाद आखिरकार मिलने की बात पक्की हो गई. वह भी कहां, तो मेट्रो के पिलर के नीचे और रात पौने बारह बजे!
कौन है ये?
मुंबई का पैपराजी!
रात-बेरात मुंबई के पॉश एरिया के चक्कर लगाते हुए घूमना ही उसका काम है. उससे मिलना हो तो ऐसा ही कुछ होने वाला था!
तय समय पर तय जगह पहुंचा. पिलर क्रमांक 57 के नीचे एक काला कुत्ता सोया हुआ था. ‘पैपराजी मुंबई’ नाम से सेव किया हुआ उसका नंबर लगाया. फोन व्यस्त.... पांच-पांच मिनट बाद बार-बार कोशिश की, लेकिन उसका फोन लगातार व्यस्त... थक-हार कर वहां से चले जाने की तैयारी में ही था कि सड़क के उस पार से कैमरे का एक कड़क फ्लैश चमक गया. मैंने चौंक कर उस दिशा में देखा, तब सामने बाइक पर बैठा एक युवक मेरी तरफ देखकर हाथ हिलाता नजर आया. कान और कंधे के बीच फोन पकड़ कर किसी से बात कर रहा था. बाइक के आईने पर उसने हेल्मेट लटकाया और एक हाथ में कैमरा पकड़कर फ्लैश मारते हुए मेरा ध्यान खींचा था.
मैं सड़क पार कर उसके पास गया. मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने उंगली से एक मिनट रुकने का इशारा किया और अगले 7-8 मिनट तक वह फोन पर ही बतियाता रहा.
‘भाई तू टेंशन मत ले, रघु ने आज तक कभी फोटो आॅप मिस किया है क्या? पीसी फ्लाइट से उतरकर सीधे बाहर कभी नहीं आएगी रे! वो पहले लाउंज में जाकर मेकअप का टचअप मारेगी और फिर आएगी! वो बाहर निकलेगी तो लाउंज वाली स्वीटी अपने को कॉल मारेगी.. सब सेट है बॉस!’
- योगेश गायकवाड़
प्रकृति को नोेंच-खसोट कर उदरस्थ करने को उद्यत इन बड़े लोगों से जवाब चाहने के लिए बच्चे जब रास्तों पर उतरते हैं...
ग्रेटा थनबर्ग.
वह सिर्फ सोलह बरस की है.
तीसरी में थी तब पहली बार ‘क्लायमेट चेंज’ शब्द सुना था. और उसके बाद वह इस विषय के बारे में जहां से, जितना भी संभव हो, जानकारी लेकर अपने भीतर संजोने लगी. ग्रेटा के स्कूल में पर्यावरण के विनाश और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले गंभीर परिणामों की जानकारी दी जाती थी. वृत्तचित्र दिखाए जाते थे. वह उनमें मग्न हो जाती थी. इस विषय पर जो भी जानकारी मिलती, उसे देखने और पढ़ने का क्रम जारी था. दुनिया-भर में चल रहे घटनाक्रम से संवेदनशील ग्रेटा दु:खी हो जाती थी. लेकिन इस बारे में वह किसी से भी कुछ नहीं कहती थी. उसकी यह चुप्पी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी.
ग्यारहवें साल में ग्रेटा ने घरवालों के अलावा बाकी किसी से भी बातचीत करना लगभग बंद ही कर दिया था. वह बाहर नहीं निकलती थी. भोजन भी कम कर दिया था.
प्रकृति-चक्र बिगड़ गया है, और बड़े लोग, नेता लोग इस बारे में कुछ भी नहीं कर रहे हैं, इसको लेकर वह बेचैन रहने लगी. बीती गरमियों में ऊष्णता की लहर के बीच जब उसका देश झुलसने लगा तो इस लड़की ने अपना बस्ता उठाया और स्कूल छोड़ कर सीधे स्वीडन की संसद के सामने धरना देकर बैठ गई. ‘हमारे बड़े होने तक यदि इस पृथ्वी का वातावरण जहरीला होने वाला होगा तो स्कूल जाकर भी क्या फायदा?’ यह सवाल पूछ कर ग्रेटा ने विश्व-भर के बड़े नेताओं को सान पर चढ़ा दिया. उसका साथ निभा रहे थे अलग-अलग देशों के बच्चे-‘फ्राईडेज फॉर फ्यूचर’ के फलक हाथों में लेकर रास्तों पर उतरने लगे हैं. पर्यावरण संरक्षण के लिए तत्काल प्रयास किए जाने चाहिए, इस मकसद से बच्चों ने अपनी-अपनी सरकारों को अदालतों में खींचना शुरू कर दिया है.
- अतुल देऊलगावकर
छत्तीसगढ़ के गनियारी गांव में तीजन बाई. मैं दंग हो कर उस अद्भुत महिला के समक्ष बैठी थी. उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे खींच कर ले गर्इं अपने बचपन में...
पद्मश्री पुरस्कार का सम्मानपत्र और रणबीर कपूर की बड़े प्यार से गले में हाथ डालकर खींची हुई तस्वीर, इन दोनों में से किसे बड़े गर्व से घर के दीवानखाने की दीवार पर लगाने के लिए चुना जाएगा?
- अपने इस मासूम-से भ्रम को लेकर मैं एक घर के छोटे से कमरे में खड़ी थी. सामने टीवी पर शुरू सत्तर के दशक की किसी देमार फिल्म (छत्तीसगढ़ी) का पार्श्वसंगीत पूरे घर को सुनाई देने लायक बड़ी ही तेज आवाज में बज रहा था. मैं कमरे की चारों दीवारों पर लगे सम्मानपत्र देख रही थी. कोई छोटा तो कोई बड़ा, कोई चौकोर तो कोई लंबा, कुछ भड़कीले-चमकीले तो कुछ मद्धिम-सोबर रंग के. हिंदी, उर्दू, इंग्लिश, जापानी आदि दुनिया की तमाम भाषा के वे सम्मान पत्र जहां जगह मिले वहां पर एक-दूसरे को संभालते हुए दीवार पर कम से कम टंगे रहने का प्रयास कर रहे थे. उसी भीड़ में पद्मश्री का सम्मानपत्र लटकता हुआ नजर आया. कमरे के कोने-कोने में एक के ऊपर एक रखी हुई, अपने संतुलन को संभालती कई चीजें थीं. पलंग का पास रखी प्लास्टिक की एक पुरानी कुर्सी पर बहुत सी कॉपी-किताबें, उन पर (शायद) उपहार में मिले कागज के पुड़े, उन पर कई कपड़े, फिर घास काटने का खुरपा और उसके ऊपर रंगत उड़ने की वजह से दयनीय नजर आने वाला लकड़ी का एक बड़ा सम्मानचिह्न..!
उस कमरे से सटे आस-पास के दो-तीन कमरों की हालत भी इससे कुछ अलग नहीं थी. उस पूरे घर की काली पड़ चुकीं दीवारें, हर कमरे से झांकते कपड़े, कई तरह के सामान की भरमार और ऐसे माहौल में दीवार पर लटकती रणबीर कपूर के साथ खींची हुई करीब तीन फुट की बड़ी-सी रंगीन तस्वीर...
यह सब देखते हुए लगा जैसे मैं किसी बड़े-से चित्र के सामने खड़ी हूं जिसके बैकग्राउंड के कोने-कोने में पड़ी चीजों के साथ काले-सफेद रंग में जीने वाला वह घर और उस पृष्ठभूमि में खुल कर नजर आने वाली वह प्रसन्न, रंगीन तस्वीर मानो उस सामान्य घर का एक अद्भुत सपना था, तीजन बाई नाम का... रणबीर कपूर द्वारा प्यार से किए गए आलिंगन के बीच उतनी ही स्थिरता से, प्रसन्नता से मुस्कुराते हुए खड़ी थीं तीजनबाई. जिस परिवार की न जाने कितनी ही पीढ़ियों ने कभी स्कूल का मुंह देखे बिना पहले तो चिड़िया मारने का और फिर चटाइयां-झाड़ू आदि बुनने का व्यवसाय करते हुए अपनी जिंदगी बिताई थीं. उसी परिवार की कभी स्कूल में न जाने वाली यह महिला हैं तीजनबाई, सिर्फ झाड़ू बुनना जानने वाली...! घर के बाहर बरामदे में मेरे पास एक कुर्सी पर वह बैठी थीं. बातचीत के दौरान भी मेरी नजर बार-बार उस कुर्सी के पीछे दीवार पर लगे ‘पद्मविभूषण’ सन्मानपत्र के फ्रेम पर पड़ रही थी. प्रचलित मायने में कहें तो एक निरक्षर महिला द्वारा हासिल किए गए देश के अत्यंत प्रतिष्ठित नागरी सम्मान की ओर...
- वंदना अत्रे
ये भारतीयों जैसे दिखते नहीं, लेकिन हैं भारतीय! अलग चेहरा, रंग-रूप की वजह से विदेशी समझा जाता है, दुर्व्यवहार होता है. न्याय की उम्मीदों के बदले अब तक निराशा ही हाथ लगी है. ये हैं सिद्दी...
कर्नाटक के उत्तर कर्नाटक जिले में मुंडगोड तहसील का छोटा सा गांव तावरकट्टा. दोपहर के 12 बज रहे हैं. झमाझम बारिश हो रही है. हल्का अंधेरा छा गया है, जिससे दोपहर में ही शाम होने का अहसास हो रहा है. चारों तरफ जंगल, पेड़ों, पत्तियों पर गिरने वाली बारिश की बूंदों का संगीत साफ सुना जा सकता है. हल्की ठंड महसूस हो रही है. गांव में प्रवेश करते ही देखा कि घरों में सन्नाटा है. कुंडियां लगीं हुई हैं. दूर-दूर तक बस खेती के काम में जुटे लोग दिखाई दे रहे हैं. पगडंडी पर कदम बढ़ाए तो देखा दूसरी ओर से कुछ महिलाएं खेत से लौट रही हैं. देखने में सभी बिल्कुल अलग. काली त्वचा, लेकिन काला-मटमैला रंग लेकिन आम भारतीयों जैसा नहीं. सिर के बाल भी अलग. छोटे, काले और घुमावदार. ऐसा लगा मानो कोई अफ्रीकी मेहमान हैं. रंग-रूप-केश अलग लेकिन महिलाओं का पहनावा पूरी तरह भारतीय. कुछ ने सलीके से साड़ी पहन रखी थी. एक ने सलवार कमीज. पास आर्इं तो गौर से देखा, उन औरतों के गले में मंगलसूत्र है और कान में बालियां. चेहरा और शारीरिक बनावट भारतीय नहीं लेकिन पहनावा और भाषा इसी मिट्टी की...मुझे लगा कि वे घर जाएंगी लेकिन वे सीधे गांव की आंगनवाड़ी पहुंच गर्इं. मैं भी पीछे-पीछे चल पड़ी. मुझे लगा कि अांगनवाड़ी इनके लिए बड़े काम की जगह है. वहां पहुंचने पर पता कि ग्रामीणों के सभी सरकारी-गैर सरकारी काम यहीं होते हैं. आंगनवाड़ी में शेड के नीचे 24-25 साल का युवक कुछ दस्तावेज लेकर बैठा हुआ था. वह भी उन जैसा ही था. काला रंग, काले-घुमावदार बाल. उसके पास एक तरह की किट रखी हुई थी और हाथों में स्मार्टफोन. महिलाएं जिस भाषा में बात कर रह थीं, वह न ही कन्नड़, न मराठी और न ही कोंकणी थी, बल्कि सभी का मिश्रण. अधिकांश शब्द कोंकणी थे. सच कहूं तो इसी अनोखेपन की खोज में मैं मुंडगोड आई थी.
- मुक्ता चैतन्य
सबकुछ तबाह करने पर उतारू भीषण चक्रवात का डटकर मुकाबला करने के लिए दमदार तरीके से खड़े समूची सरकारी मशीनरी की रोमांचक कहानी
3 मई 2019
चक्रवात ‘फोनी’ ने ओडिशा के तट को झंझोड़कर रख दिया.
200 किमी प्रति घंटे रफ्तार की तूफानी हवा और सबकुछ तबाह कर देने वाली बारिश.
14 जिलों के तकरीबन 20 हजार गांवों को मानो उड़ा ले गई.
इमारतें, मोबाइल टॉवर्स, पेड़, बिजली के तार....कुछ भी बाकी नहीं रहा!
कई हजार किलोमीटर लंबाई के रास्ते गायब से हो गए, लेकिन कुदरत के इतने भीषण तांडव के बाद भी मरने वाले लोगों की संख्या थी (केवल) 64!
यह चमत्कार कैसे हुआ?
केवल 24 घंटे में पूरे साढ़े पंद्रह लाख लोगों को ‘साइक्लॉन शेल्टर्स’ में स्थलांतरित करने का जो जोखिम प्रशासन ने उठाया, उस आत्मविश्वास की वजह था आपदा प्रबंधन में ओडिशा को
दुनिया के नक्शे पर स्थापित कर देने वाला ‘अर्ली वॉर्निंग डिससेमिनेशन सिस्टम!’
आमतौर पर बेहद संवेदनहीनता के साथ मंथर गति से चलने के आरोप झेलने वाली सरकारी मशीनरी
बेहतरीन योजना के साथ क्या चमत्कार कर सकती है, ओडिशा ने साबित करके दिखा दिया.
उसी चमत्कार के रहस्य की परतों को खोलने के लिए ओडिशा के गांव-गांव जाकर किया गया खुलासा...
- समीर मराठे
आज यह सुनकर अफसोस होता है, जब नई नस्ल सवाल करती है कि उन्हें इस देश ने क्या दिया? असंख्य कुर्बानियों के बाद हमें आजादी मिली है. नए जमाने को उस संघर्ष की तासीर पता नहीं है...
बात करीब चौबीस-पच्चीस साल पुरानी है. उस दिन मैं महात्मा गांधी के सहयोगी रहे महेशदत्त मिश्र के पास बैठा था. मैंने उनसे पूछा था कि क्या उनकी पीढ़ी आजादी के बाद की नौजवान पीढ़ी और नए हिंदुस्तान से प्रसन्न है. उनका उत्तर था कि गुलामी की जंजीरों से आजाद हैं- यह स्थिति तो सौ फीसदी राहत देती है, लेकिन आजादी के बाद जिस तरह नई नस्लें आ रही हैं, उनको देखकर कह सकता हूं कि स्वतंत्रता सेनानियों का सपना अभी अधूरा है. मिश्र जी बोले, ‘हम लोग तो चले. मगर भारत जिस तरह से जवान खून को उभरता देख रहा है, वह निराश करता है. यह खून सिर्फ अपना करियर देखता है. देश का करियर कौन देखेगा भाई?
उनके सवाल ने झकझोर दिया. सचमुच अपने भविष्य की चिंता करते हुए हम भारत के भविष्य पर ध्यान नहीं दे पाए. आने वाले युवाओं के लिए अतीत की दास्तानों की धरोहर हमने नहीं सौंपी. बचपन में हमारे घर दादाजी से मिलने अक्सर मशहूर क्र ांतिकारी पंडित परमानंद आया करते थे. उनका गांव हमारे गांव के पास ही था. जब भी आते, अपनी जिंदगी के अद्भुत और अविश्वसनीय किस्से सुनाया करते. किशोर हो रहे हम बच्चे हैरतभरी आंखों से उन्हें देखा करते थे. पंडित परमानंद 29 साल तक अंग्रेजों की कैद में रहे थे, जिनमें 21 साल अंडमान की सेलुलर जेल की कालकोठरी में काटे थे. उन्हें जब 13 सितंबर 1915 यानी 104 साल पहले गदर पार्टी के साथ रहते हुए न्यायाधीश ने फांसी की सजा सुनाई तो पंडित जी ने ठहाका लगाया. पूरी अदालत उस ठहाके से हिल गई. सरकारी वकील ने जज से कहा, ‘देखिए जज साब! यह मौत से मखौल करता है. एक दिन हम बच्चों ने आजादी के आंदोलन की कहानी सुनाने की जिद की. पंडितजी ने उस अपराह्न जो कुछ सुनाया, आज भी मेरे मानस पटल पर उसका एक-एक शब्द अंकित है. जो याद है, उन्हीं के शब्दों में सुनाने की कोशिश करता हूं.
- राजेश बादल
पहाड़ों-खाइयों से होकर टेढ़ी-मेढ़ी राह पार करते हुए हजारों मील बेलगाम बहने वाली नर्मदा से मिलने लोग यहां आते हैं. मैं भी गया था... उसी की कहानी!
नर्मदा के घाट पर साधु अनेक हैं!
उनमें ज्ञानी चुनिंदा,
जीवन का युद्ध हारकर नर्मदा की गोद में आए
थके-हारे लोग ही ज्यादा!
चेहरे पर वीरानी और खाली नजरों में शुष्क आकाश लेकर
सीढ़ियों पर अपनी ही धुन में बीड़ियां पीते बैठे रहते हैं.
यह धुन बीड़ी की, गांजा-हशीश की,
शराब के नशे की या खाली वक्त की है?
कितना भी ज्ञानी प्रतीत होता साधु हो, या उम्र में, दाढ़ी के आकार में बड़ा-छोटा हो,
फिर भी हमारी ओर आशा भरी नजरों से एक बार जरूर देखेगा!
- आशा से कौन मुक्त हुआ है?
...उनके साथ मैं काफी घूमा हूं. चर्चाएं हुई हैं.
कभी बोलकर, कभी बिना बोले.
कमाल के होते हैं ये लोग.
शारीरिक जरूरतें कम हो चुकी होती हैं. लैंगिक भूख तो गांजे के नशे के कारण कम होती जाती है.
... कहीं ये लोग लैंगिक निवृत्ति और भूख की मृत्यु को तो मोक्ष नहीं मानते?
- चंद्रमोहन कुलकर्णी
मस्ती-चढ़ी अमीर मुंबई के पेट में मानो गुप्ती घुमा दी हो, ऐसे तीखे शब्दों में, आत्मसम्मान बचानेलिए खून-पसीना एक कर रहे हिप-हॉपर्स की दुनिया की कहानी...
क्या बोलेगा....वही सीन चल रहा है!
रैपर्स से बात करें तो एक खास मुद्दे पर आकर वे चुप्पी साध लेते हंै. डांसर और बीट बॉक्सर तो एकदम ही शांत हो जाते हैं. विषय होता है- घर-परिवार का!
दरअसल, कई के परिवारों को ये हिप हॉप कल्चर मालूम ही नहीं है. तिस पर धारावी के कई लोगों का तो पक्का भरोसा यही है कि लड़कों की ये टोली मटरगश्ती करते हुए कहीं बीड़ी पीती बैठी रहती है. ये मनमाने बकबक करते हैं. काम-धाम कुछ नहीं, बैठकर मुफ्त का खाते हैं.
मां-बाप के इस आरोप में कुछ झूठ है क्या? ...तो, पूरा का पूरा झूठ है, ऐसा नहीं कह सकते. कुछ तो ऐसे होते ही हैं. लेकिन सब नहीं. उलट, रैप, ब्रेक डांस के कारण कुछ लोगों ने बीड़ी और दारू छोड़ दी. कला के इस नशे ने उन्हें ‘इंसान’ बना दिया है. मन के गुस्से को बाहर निकलने की राह मिल गई है. वैसे, मन की आग से पेट की आग ज्यादा बड़ी होती है.
धारावी के बच्चे दस की उम्र से ही काम करने लग जाते हैं. पैसे कमाते हैं. आजाद हो जाते हैं. घर वाले तो मान ही बैठते हैं कि 13-14 साल का बच्चा एक अलग व्यक्ति है और उनकी अपेक्षा रहती है कि वह अपना पेट खुद पाले. अधिकतर बच्चे वैसा करते भी हैं. लेकिन कई रैपर्स वैसा काम नहीं करते हैं. जल्दी से बोल पड़ते हैं, ‘रैप और जॉब एक साथ नहीं होगा. मेरा आर्ट बहुत हाई है!’
वे स्वयं इसी ‘हाई’ में रहते हैं और अपने माता-पिता से यह बात छुपाते हैं कि वे रैपर हैं. क्योंकि रैप शब्द का घर-घर में विरोध होता है. ब्रेक डांस का तो होता ही होता है. बीट बॉक्सिंग यानी मुंह से आवाज निकालने के हुनर की खासियत तोो बहुतों को मालूम ही नहीं है. इन सबमें, डीजेइंग वालों को घर वाले इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि अब मुंबई की शादियों में न केवल डीजे को बल्कि वहां नाचने वालों को भी पैसे मिलने लगे हैं. और इसी लिए डीजे की क्लास में भीड़ भी ज्यादा दिखती है.
बाकी के लड़के एक वाक्य में जवाब देते हैं, ‘घर वालों को कुछ नहीं मालूम!’ परिवार से टूटी हुई ये तरुणाई चिढ़ी हुई मालूम पड़ती है. उस पर खाने-पीने की मारामारी, हर कोई तो रातों-रात हिट नहीं हो जाता न...
इधर ‘गली बॉय’ के आ जाने से कई परिवारों को लगने लगा है कि हमारा बेटा भी ऐसा ही कुछ करेगा, सफलता के झंडे गाड़ेगा. हाल ही में अल्ताफ टोनी, मानस धीवर के घर वालों ने उनकी कला को सराहना शुरू किया है. बहुत समय तक तो इनको भी अपनी पहचान छुपा कर घर में रहना पड़ रहा था-ऐसा ये लड़के बताते हैं.
बाकी के लड़कों के घर की लड़ाई ही खत्म नहीं हो रही है और ‘क्या बोलता रैपर?’ ये सवाल करने पर उत्तर मिलता है, क्या बोलेगा, वही सीन चल रहा है!
- मेघना ढोके
ऐसा रूहानी प्रेम जो सिर्फ किस्से-कहानियों में सुनने को मिलता है. जिसमें वासना नहीं होती और जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती. पढ़िए ऐसे ही प्रेम की अनोखी मिसाल.
छुट्टन ने कहा- ‘तुम्हारी तालीम सच्चाई के आला उसूल पर हुई है और मुझे बचपन से ही झूठ और फरेब दिखाया गया था. तुम शरीफ थे - जिसकी जिंदगी की बुनियाद सच्चाई और खुलूस पर रखी जाती है और मैं बाजार में बैठने वाली एक तवायफ थी- जिसकी सारी जिंदगी कारोबारी थी. जो अपने नाज बेचती है और अपने जिस्म बेचती है. वह अपने पेशे के अंदर मुहब्बत कर भी नहीं सकती. अगर वह ऐसा करे तो पेशे के खिलाफ यह गद्दारी होती है. वह फरेब मुजस्सम होती है. उसका रोना भी फरेब. उसकी हंसी भी फरेब. मगर सबसे बड़ी उसकी रूह की गंदगी होती है, जिसको वह अपने खूबसूरत जिस्म के अंदर छुपाए रहती है. इन सब बातों के बावजूद तवायफ फिर भी औरत है. खुदा ने जो फितरी जज्बा औरत को दिया है उससे तवायफ भी अलग नहीं.’
अली के चेहरे के बदलते रंग को देखते हुए छुट्टन ने अपनी बात जारी रखी. ‘मैंने तुमको बाजारू और आवारागर्द लड़का समझा था. फिर मुझे ताज्जुब हुआ जब मैंने देखा कि तुम इन लोगों से अलग हो जो भीड़ लगाए मेरे दीदार के लिए बैठे रहते हैं. तुम उनसे अलग हो. जब मैं खिड़की पर आती तो तुम टकटकी लगाए देखते और जब वापस जाती तो तुम भी चुपचाप उठकर चले जाते. इस तरह से कोई चीज अंदर ही अंदर सुलग उठी. मैं तुम्हारी तरफ खिंचने लगी. यह कैसे हुआ आज तक मालूम न हुआ. मैंने यह भी देखा कि तुम राह से भटके हुए हो-फिर रास्ते पर आ भी सकते हो. बस एक रहनुमा की जरूरत है. जब मुझे यह मालूम हुआ कि तुम्हारे वालिद जिंदा नहीं हैं और तुम्हारे रिश्तेदार तुम्हें तबाह करने की कोशिश में लगे हुए हैं - फिर तुम ऐसी मां की औलाद हो जो शरीफ भी हैं बड़ी मुहब्बत करने वाली भी मगर अपनी पर्दानशीनी की वजह से तुम्हारी देखभाल ठीक से नहीं कर पा रहीं तो मैंने अपनी कारोबारी जिंदगी से हटकर वो करना चाहा जो मेरे पेशे के सरासर खिलाफ था. मगर यह काम एक औरत ही कर सकती थी.’
- अरुण सिंह
रसायन या कृत्रिम वस्तुओं का प्रयोग न करते हुए कपड़े पर प्राकृतिक रंगों की छटा बिखेरने वाले कच्छ के ‘अजरखपुर’ के खत्रियों की संघर्षपूर्ण दास्तां...
26 जनवरी 2001
सुबह के 9 बज रहे थे. नन्हा सुफियान अपने घर के बाहर स्नानघर में नहा रहा था. अचानक उसके पैरों तले जमीन, सिर पर छत तेजी से हिलने लगे. वह घबरा गया. स्नान बीच में छोड़कर जल्दी-जल्दी कपड़े पहने और बाहर निकलने लगा. लेकिन चंद पलों बाद स्नानघर की छत भरभराकर गिर पड़ी. सुफियान खुशकिस्मत था कि छत उसके सिर पर नहीं गिरी, लेकिन वह उसके मलबे के नीचे दब गया. जोर-जोर से रोने लगा. मदद की गुहार लगाने लगा. शायद उसकी गुहार सुनने वाला आसपास कोई नहीं था. बाहर से उसे चीख-पुकार सुनाई दे रही थी. सुफियान ऐसे ही कई घंटे मिट्टी और पत्थरों के ढेर के नीचे दबा पड़ा रहा. शाम को कोई शख्स वहां आया और उसे मलबे से बाहर निकाला.
बाहर आकर सुफियान ने जो नजारा देखा, उसकी आंखें फटी की फटी रह गर्इं. दिल दहल उठा. भयाक्रांत लोग यहां-वहां भाग रहे थे. मकान खंडहर में तब्दील हो चुके थे. सबकुछ तहस-नहस हो चुका था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ है. उसकी नजरें अपनों को ढूंढने लगीं. उसका घर भी मलबा बन चुका था. दादी और दो साल छोटी बहन जिसमें दबे हुए थे. पास ही अब्बू सिसकियां ले-लेकर रो रहे थे. अम्मी की आंखें रो-रोकर सूज गई थीं.
सुफियान की तरह खेत में काम कर रहे औरंगजेब को भी जलजले की आहट महसूस नहीं हुई. उसे तो बस यह लगा कि पैरों के नीचे की धरती डोल रही है. पड़ोस के खेत में शोर-शराबा सुनकर वह उस ओर भागा. लोग बदहवास होकर यहां-वहां भाग रहे थे. पनाह की उम्मीद में वह खेत में बनी छोटी झोपड़ी की ओर भागा, लेकिन वह भी ताश के पत्तों की तरह ढह चुकी थी. किसी भीषण संकट की आहट से वह सहम गया. जमींदोज हो चुके घर को देखकर उसके होश उड़ गए. उसके अपने मलबे के नीचे दम तोड़ चुके थे.
- मृदुला बेले-देशमुख
भगवान बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं के गवाह रहे स्थल के समृद्ध अतीत और उदासीन वर्तमान की कहानी
चारों ओर एक घना-सा सन्नाटा घिर आया था. कभी-कभी हवा के झोंके से पत्ते खड़खड़ा उठते थे और फिर सब कुछ, छोटी-बड़ी, जानी-अनजानी आवाजें एक अथाह शांति में डूब गई थीं.
आम के पत्तों में छन कर जाड़ों की फीकी धूप नीचे उतर आई थी. मैं वहीं पेड़ों के पास बैठ गया. यह आमों का एक घना बगीचा था. अंबारा चौक पर आम्रपाली ढाबे के किशोर स्वामी ने इसी बगीचे के बारे में बताया था कि यह अंबपाली का था, जहां भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ पधारे थे. देखने के लिए वहां कुछ भी नहीं था. किंतु पल भर में सब कुछ बहुत सजीव-सा हो आया. इतना सजीव और इतना स्पष्ट कि यह महसूस नहीं होता है कि इस बगीचे के निर्जन एकांत और मेरी यहां मौजूदगी के बीच लगभग ढाई हजार वर्षों का एक लंबा अंतराल गुजर गया है. लगता है, जैसे भगवान बुद्ध के लिए भोजन तैयार करती गर्वीली अंबपाली वहां मुझे पाकर ठिठक कर खड़ी हो जाएगी.
लिच्छवियों की राजधानी वैशाली भगवान बुद्ध को अत्यंत प्रिय थी. वैशाली के वज्जिसंघ या लिच्छविगण के आधार पर उन्होंने अपने भिक्षुसंघ का संगठन भी किया. वे वैशाली कई बार आए और यहां के कूटगारशाला में उनके बहुत सारे उपदेश भी हुए. उन्होंने दो वर्षावास यहां किए. ‘विनय’ के कई नियम यहीं बने. भिक्षुणी संघ की स्थापना वैशाली में ही हुई. अनेक स्त्री-पुरुष बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए. बौद्ध साहित्य में इनके नाम सुरक्षित हैं. इन्हीं में वैशाली की प्रसिद्ध नगरवधू अंबपाली भी थी.
वैशाली आकर तथागत अंबपाली के आमों के वन में ठहरे. अंबपाली को सूचना मिली. वह अपनी सहचरियों के साथ आम के वन में पहुंची. तथागत का अभिवादन किया. वंदना की. और एक ओर बैठ गई. भगवान ने धार्मिक कथा से अंबपाली को समुत्तेजित किया. उसने भगवान के उपदेशों को सुना. अंबपाली ने भगवान से हाथ जोड़कर आग्रह किया.
‘भगवन! कल का भोजन स्वीकार करें!’
भगवान ने मौन स्वीकृति दी.
वैशाली के लिच्छवियों ने भी भगवान का आगमन सुना. वे अपने-अपने रथों पर सवार हो आम्रवन की ओर चले. रास्ते में अंबपाली मिली. अंबपाली ने उन्हें बताया कि तथागत अपने भिक्षुसंघ सहित कल उसके अतिथि होंगे. लिच्छवियों को सहसा विश्वास नहीं हुआ. क्या सचमुच तथागत ने उसका आमंत्रण स्वीकार कर लिया है? ‘ओह अंबपाली, सौ हजार लेकर भी यह भात हमें करने के लिए छोड़ दें.’
‘लिच्छवियों! नहीं’ अंबपाली ने हंस कर कहा, ‘आप यदि समस्त जनपद दे दें, तब भी यह भात नहीं छोड़ने वाली हूं.’ अंबपाली ने गर्व से कहा.
- अरुण सिंह
